पीढ़ियों की कड़ी
पीढ़ियों की कड़ी
तुम्हारे दादा का दिल बावन की उम्र में रुक गया,
वे संकेतों को अनसुना करते रहे, जब तक रुक न गए।
तुम्हारी दादी कभी तुम्हें स्कूल छोड़ने न आ सकीं,
डायबिटीज़ से वे पहले अपने पैर, और फिर अपनी जान बचा न सकीं।
जब तुम बिटिया को हवा में उछालते हो, और घुटने चटक उठते हैं।
छोटे-छोटे दर्द, तुम भी दादा-दादी की तरह अनदेखा कर देते हो।
आज से बीस बरस बाद — क्या तुम उसकी शादी में नाच पाओगे?
तीस बरस आगे — क्या तुम उसके बच्चों को अपनी कहानियाँ सुना पाओगे?
पुरखे पीछे, बच्चे आगे — बीच में तुम हो एक कड़ी।
खाओ, चलो, सोओ उनके लिए, आस खड़ी जिनकी बड़ी।
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लोक-शैली · स्त्री-पुरुष युगल स्वर
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— Ramesh Jain