गति ही जीवन है
गति ही जीवन है
बहुत देर स्थिर रहो, तो तुम्हारे जोड़ खुद बोलने लगते हैं,
जैसे फेफड़ों को हवा चाहिए, मसल्स वैसे ही गति माँगती हैं।
तुम्हारा हर कतरा, हर अंग, बस चलने-फिरने के लिए बना है।
जो शरीर चलता रहता है, वही असल में टिकता है।
जो बदन काम न लाया जाए, वो साथ छोड़ने लगता है,
पचास में कुर्सी तुम्हें अच्छे से, जानती और पहचानती है।
साठ में हर सीढ़ी पर चढ़कर, तुम राहत महसूस करते हो—
उम्र की ताकत के झूठे भ्रम में, चुपके से मौत शुरू हो जाती है।
गति है जीवन का सुबूत, कि तुम अभी यहीं पर हो,
मरने से पहले मत मरो, जब ये बदन थिरकता हो।
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लोक-शैली · स्त्री-पुरुष युगल स्वर
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— Ramesh Jain