ज़िंदगी महसूस करो
ज़िंदगी महसूस करो
दिन कटता जाता है—पैर चलते हैं, तुम साँसें लेकर वक़्त बिताते हो,
तुम बेटी को स्कूल छोड़ते हो, और बेख़बर वापस आ जाते हो।
दोस्त का फ़ोन आता है—तुम स्क्रीन देखते हुए, बस आधा सुनते हो,
रात के खाने पर परिवार के साथ, तुम बग़ैर स्वाद अपना खाना निगलते हो।
अब इसे महसूस करो—ये बाग़, वो बेटी तुम्हारे साथ-साथ हंसती-खेलती है,
दोस्त की परेशान आवाज़ सुनने पर, तुम्हारी सजगता उसका दुख-दर्द घटाती है।
तुम खाना खाते हो, तो वो महज़ साथ नहीं, एक अनमोल तोहफ़ा बन जाता है,
जब तुम बिस्तर पर लेटते हो, ये संतुष्ट बदन सिर्फ़ सुकून माँगता है।
जो तुमने कभी महसूस नहीं किया, वो तुम्हारा कभी भी था ही नहीं,
और जो तुम्हारा कभी था ही नहीं, वो जीवन तुमने जिया ही नहीं।
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लोक-शैली · स्त्री-पुरुष युगल स्वर
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— Ramesh Jain