नींद में सफ़ाई
नींद में सफ़ाई
तुम देर तक जागते हो—मज़ा रुकने नहीं देता,
तुम लेटे रहते हो—पर मन तुम्हें आज़ाद नहीं करता।
एक को किताब-सा बंद कर दो, दूसरा ख़ुद को लिखता जाता है,
अंधेरा खड़ा है, पर नींद को रास्ता नज़र नहीं आता है।
फ़ोन रख दिया है तुमने, कमरे में सन्नाटा छा गया है,
ख़्याल एक-दो चक्कर काटकर, अपनी पकड़ छोड़ देते हैं।
सांसें धीमी होती हैं, दिमाग़ अपना काम शुरू कर देता है,
तुम चिड़ियों की चहचहाहट से जागते हो, और ख़ुद में लौट आते हो।
दिन भर के उलझे ख़यालों को, नींद चुपके से सुलझाती है,
आज का बोझ उतारकर, कल को और भी सुहाना बनाती है।
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लोक-शैली · स्त्री-पुरुष युगल स्वर
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— Ramesh Jain