एक थाली, दो भूख
एक थाली, दो भूख
तुम स्वाद के लिए खाते हो, जब तक वो स्वाद तुम्हें भारी नहीं पड़ता,
तुम सेहत के लिए खाते हो, जब तक थाली से तुम्हें खौफ नहीं होता।
एक तुम्हारी उम्र चुराता है, दूसरा तुम्हारा जीना ही छीन लेता है—
पर बैठने लायक थाली वही है, जिसमें दोनों का बसेरा होता है।
तुम्हारी दादी खाने को कभी दवा नहीं कहती थीं,
जो जी को भाए और जो सेहत जगाए, वो वही बनाती थीं।
उनकी उस प्यारी रसोई की, अपनी ही एक महक थी,
तुम सब कुछ चट कर जाते थे, और पूछते—“क्या थोड़ा और है?”
स्वाद का दीवाना आधा जिए, सेहत का दीवाना आधा,
दोनों मिलें एक थाली में — ज़िंदगी महके, नियम नहीं।
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लोक-शैली · स्त्री-पुरुष युगल स्वर
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— Ramesh Jain