उस screen ने तुम्हें बंद कर दिया
उस screen ने तुम्हें बंद कर दिया
तुम्हारा हाथ अपने आप उसकी ओर बढ़ता जाता है,
खोली थी एक मिनट के लिए, एक घंटा चला जाता है।
थककर नीचे रखते हो, पर हाथ फिर लौटता आता है,
दिन, एक-एक छुअन में, उसकी माया में खोता जाता है।
आँखें थक जाती हैं, हाथ दुखते हैं और गर्दन अकड़ जाती है,
पाँच मिनट की बात थी, screen पूरी शाम निगल जाती है।
बिटिया कुछ कहती रही, तुमने screen को जवाब दिया,
screen की नीली रोशनी में सो गए, नीलापन आँखों में भर गया।
वह screen जो बंद ही नहीं होती, रखती है तुम्हें अपनी छाया में,
तुम भक्त-ग़ुलाम, और तुम्हारी पूरी ज़िंदगी बीतती है उसकी माया में।
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— Ramesh Jain