सोच बढ़ाओ
सोच बढ़ाओ
अब इस दिमाग़ को भी वही काम और देखभाल दो, जो इसने कमाई है,
उम्र भर का अनुभव, चेहरे, और सही-ग़लत की समझ इसने बचाई है।
हाँ, कभी-कभी नाम वक़्त पर याद नहीं आता, बात का धागा छूट जाता है,
दोपहर ढलते-ढलते दिमाग़ पर धुँध सा कोहरा छा जाता है।
पर इसे Engage करो, तो ये सोए हुए रास्ते फिर से जगा देगा,
ध्यान तेज़ करेगा, और खोए हुए शब्द वापस ला देगा!
रोज़ कुछ नया सीखते रहो, जो भी तुम्हें प्यारा है,
दिमाग़ को बस जगाकर रखो, वही तो ख़ुशियों का राजा है!
सोचना-समझना और विश्लेषण ही है हर मानव की पहचान,
दिमाग़ को सदैव सक्रिय और पैना रखना, है जीवन का सम्मान!
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ग़ज़ल · एकल पुरुष स्वर
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— Ramesh Jain