जीते रहो
जीते रहो
पचहत्तर में आकर शरीर कभी-कभी बहस करने लगता है,
सीढ़ियों पर घुटने अटकते हैं, और साँस ज़रा जल्दी फूल जाती है।
कोई नाम ज़ुबान पर आने के पहले ही अटक जाता है,
और उस कुर्सी को ख़ाली देखकर, दिल भर आता है।
पर यह वो दौर है जो ढलते शरीर को सँभालना जानता है,
दर्द हो या कमज़ोरी, इलाज अब मुस्कुराकर मानता है।
तो reset करो, और इन सालों को किसी बड़े मक़सद से जोड़ दो,
नई कुर्सियाँ भरो, नई ख़ुशियाँ ढूँढो, निराशा को पीछे छोड़ दो!
सूरज ज़रा सा ढला सही, पर शाम अभी भी दूर है,
समय है, जश्न मनाओ… अभी तो बहुत कुछ बाक़ी है!
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ग़ज़ल · एकल पुरुष स्वर
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— Ramesh Jain