अनसुनी धुन
अनसुनी धुन
फेफड़ों की सुध तब आती है, जब वे जलने लगते हैं,
दिल को तब पहचान पाते हो, जब वह ज़ोर से धड़कता है।
जो साँस चुपचाप तुम्हें पल-पल जिलाती रही,
न ही उसका शुक्र किया, न ही कभी उसे सुना।
लाखों धड़कनें चलती रहीं — तुमने एक न गिनी,
हज़ारों साँसें आती-जातीं रहीं — सब अनसुनी रहीं।
जब-जब हल्की थकान आई, जब-जब भारी हुई साँस,
हर चेतावनी टालते रहे — कहते रहे “कुछ नहीं, कुछ नहीं”।
कल रात जो दर्द सीने में उठा, वो एकाएक नहीं आया था,
जिस भारी साँस को तुम अनसुना करते रहे, ये उसी का नतीजा था।
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लोक-शैली · स्त्री-पुरुष युगल स्वर
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— Ramesh Jain