Health as Life

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घंटी तुम्हारी, डोर उनकी

घंटी तुम्हारी, डोर उनकी

घंटी तुम्हारी, डोर उनकी

कान से पहले हाथ सुनता है, अपने-आप जेब पर पहुँच जाता है,
कहीं भी घंटी बजे, मन सोचने लगता है, ‘कहीं ये मेरे लिए तो नहीं!’
screen पर अनजान नंबर है, फिर भी तुम घूरते रहते हो,
किसी काम में डूबे थे तुम, एक झटके में सब छोड़ देते हो।

phone के बाद दिमाग़ सुन्न है, भूल गए किस काम से यहाँ आए हो,
इस जीवन में चैन कहाँ, रुकावटों के पालतू साए बन गए हो।
खाने की मेज़ पर जवाब देते हो, बिस्तर में पड़े-पड़े जवाब देते हो,
जागते सुध-बुध खो दी थी, अब सपनों में भी जवाब देते हो।

जो घंटी तुम्हें नचाए, वो सेवक नहीं, तुम्हारी मालिक है,
तुम बस एक कठपुतली हो, ये सब उस सूत्रधार की माया है।

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— Ramesh Jain