सेहत बनाओ
सेहत बनाओ
इस शरीर को प्यार और केयर दो, जिसका ये हक़दार है,
ज़िंदगी भर तुम्हारा बोझ उठाया, तुम्हारा हर अंग इसका कर्ज़दार है।
Unused muscles ढीले हो जाते हैं, बैलेंस डगमगाता है,
और बिना हिले-डुले भी साँस चढ़ती है, दिल घबराता है!
पर माँगकर तो देखो, ये देह आज भी मुस्कुराकर साथ देती है,
नई muscles फिर बनती हैं, और डगमगाती चाल सँभल जाती है!
तो कदम बढ़ाते रहो रोज़ थोड़ा, उस ज़िंदगी की तरफ़ जो तुम्हें प्यारी है,
जिस शरीर को तुम सँभालोगे, वही तुम्हारी सबसे सच्ची यारी है!
करते रहोगे रोज़ अगर देखभाल, तो ये देह बनेगी फ़ौलादी ढाल,
जितना इसे तराशोगे तुम, उतने सुनहरे होंगे आगे के साल!
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ग़ज़ल · एकल पुरुष स्वर
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— Ramesh Jain